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Sustainability और छोटे होते शहरी मकान

 

 

Sustainability and the ever-shrinking size of Houses

 

The ongoing tryst between confinement and luxury of nature! And how! A connoisseur of plants yearns to give greenery the ‘space’ it deserves in the urban context.

See how the transition in lifestyle from rural to urban can deprive us of the bounty of nature – well, for now, that is the only complain the writer has from life!

Is there a way forward to create a balance in our compact urban dwellings through Sustainability? The abundance of the burgeoning bougainvillea may have to give way to more utilitarian plants like lemons and tomatoes due to constraint of space.

But this devotee of nature, who is an architect by profession, persists to incorporate natural elements through sustainable design, and eventually triumphs over his clients to allow him more scope for greenery within the rigid forms!

(You can request for an English translation by writing to yourlocalfeedback@gmail.com) – meanwhile, enjoy the beautifully written Hindi prose in its entirety!)

 


 

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ज़िन्दगी आज मुझसे ख़फा है

चलो छोड़ो,कौन सी पहली दफा है।

मेरे शहर वाले घर के आंगन में जो छोटा सा प्लांटर बनवाया था, माँ ने वहाँ कुछ पौधे उगाये हैं। कुछ पुदीने, कुछ प्याज़, मिर्च, टमाटर और कुछ तुलसी। आर्किटेक्ट होने के नाते मैंने वहाँ पहले से ही सब तय कर रखा था। बॉगैंबेलिया, Rhapis excelsa, कुछ लताएं philodendron की और एक पेड़ चम्पा का। इनमें से कुछ तो थीं अपनी तयशुदा जगह पर, मगर इन सब के बीच माँ ने अपने लिए थोड़ी जगह बना ली थी।

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वो Corbusier वाला फ्रेम अपनी जगह, माँ का बगीचा अपनी जगह। खैर उस दिन की सब्जी में दो तिहाई हिस्सा अपना था। ना महँगाई का खौफ ना कीटनाशक का डर। अब थोड़ा थोड़ा sustainability पल्ले पड़ रहा था।

बचपन में मुझे लगता था, दादाजी तो बड़े रईस हैं। सब कितना पूछ्ते हैं। किसी भी चीज़ की कोई कमी नहीं। हो भी क्यों? सब कुछ तो घर पर ही था। चावल घर का, सब्जियां घर के। दूध हो या अंडे या किसी मुर्गे-तीतर का मांस, सब घर पर मौजूद था। यहाँ तक कि मौसमी फलों की पैदावार भी घर पर ही थी। बाहर से सिर्फ अखबार और कपड़े।

फिर पापा ने नौकरी कर ली। कुछ सालों में हम शहर आ गए, और हम रईश से मिडिल क्लास हो गए। अब हमारी हर जरूरत पर पैसे लगने लगे। जरूरतें भी बढ़ गई। और ये पूरा का पूरा सफ़र मैंने खुद देखा है।

खैर जो भी हो, आज रसोई पर कुछ ही प्रतिशत हिस्सा अपना उगाया पा मैं बहुत खुश हुआ। माफ करना सावनी (lagerstroemia indica), अब तुम्हारी जगह कड़ी पत्ते और नींबू के पौधों ने ले ली है।

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ये सब तो खुशी की बातें हैं, फिर ज़िन्दगी ख़फा कहाँ से है? हुआ यूँ कि मैं जब वापस इन सबकों के साथ अपने काम पर लौटा तो सोचा ये बातें अब अपने मुवक्किल को समझाऊंगा। अपने 20 मीनट के प्रेजेंटेशन में पहले तो मैंने एक आंगन डाला, फिर उस से जी नहीं भरा तो कुछ पौधे भी लगा दिये। पौधों के इश्क़ में मैं अँधा और बावला दोनों ही हो गया था।

कुछ पौधे!?

यहाँ एक पौधा लग जाये तो ग़नीमत।

बाप रे! यूँ लगा जैसे किसी मुर्दे को समझा रहा हूँ साँस कैसे लिया जाए।

अब तो लोग बारिश भी टी वी पर ही पसंद करते हैं। और मैं फूलों का प्रेमी, बारिश का आशिक़ और पेड़ो का दीवाना। जाने मेरा क्या होगा?

बस इतना सा ग़म है।

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